राज्य हित में जनसेवा का भाव जाग्रत करें लोकसेवक तथा जनप्रतिनिधि - TOURIST SANDESH

बुधवार, 25 दिसंबर 2024

राज्य हित में जनसेवा का भाव जाग्रत करें लोकसेवक तथा जनप्रतिनिधि

 सम्पादकीय

राज्य हित में जनसेवा का भाव जाग्रत करें लोकसेवक तथा जनप्रतिनिधि

मध्य हिमालय की गोद में बसा छोटा सा पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड की मूल संस्कृति, देव संस्कृति से आत्मसात करती है। इसीलिए इस भूभाग को देवभूमि के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। लम्बे जनान्दोलन के बाद 9 नवम्बर 2000 को जब उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखण्ड राज्य का गठन हुआ था तो राज्य के निवासियों को बहुत अधिक उम्मीदें थी कि, राज्य की नीति पर्वतीय जनानकूल बनेगी तथा प्राकृतिक रूप से समृद्ध राज्य में चंहु ओर समृद्धि होगी। राज्य अपने उन उद्देश्यों को पूर्ण करेगा जिन उद्देश्यों को लेकर राज्य का गठन हुआ था परन्तु विकास की दौड़ में उत्तराखण्ड अपनी मूल प्रकृति से भटकता हुआ सा प्रतीत होता है। राज्य बने 24 साल व्यतीत हो चुके हैं, भले ही इन 24 सालों में राज्य गठन के बाद राज्य में ढांचागत विकास तो बहुत तेजी से हुआ है परन्तु इस भौतिक विकास के लिए राज्य निवासियों को आर्थिक संसाधनों सहित पर्यावरण तथा प्राकृतिक क्षति के रूप में भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। अप्रतिम प्राकृतिक सुन्दरता से परिपूर्ण इस हिमालयी राज्य में हरियाली से आत्मसात् करते हुए विकास की नई इबादत लिखने की आवश्यकता थी परन्तु जिन उद्देश्यों को लेकर क्षेत्र का आमजनमानस आन्दोलित हुआ था वह कहीं बहुत पीछे छूट कर नेपथ्य में चले गये हैं। एक ओर राज्य के प्राकृतिक संसाधनों पर बाहरी लोगों ने कब्जा जमाकर बेहदसा दोहन कर राज्य को भारी आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्षति पहुंचायी है तो दूसरी ओर पर्यावरण को भी भारी नुकसान हुआ है। राज्य में इस समय आर्थिक संसाधन, सामाजिक संरचना, राज्य की सांस्कृतिक विरासत, बोली-भाषा, प्राकृतिक सुन्दरता, जैवविविधता तथा देवभूमि का देवत्व खतरे में है। राज्य में भ्रष्टाचार अपने चरम पर होने के कारण आमजन त्रस्त है। राज्य की प्रतिभाएं उचित अवसर न मिलने के कारण दम तोड़ रही हैं। 

आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसके मूल में क्या कारण रहे हैं? जब भी इस प्रश्न के मूल में जाते हैं तो एक ही उत्तर प्राप्त होता है राज्य के जनप्रतिनिधि तथा लोक प्रशासकों का राज्य के प्रति समर्पण भावना का अभाव। लोकसेवकों तथा जनप्रतिनिधियों ने स्वयं की सुविधाओं को जुटाने के लिए तो हर प्रयास किया है परन्तु राज्य हित में सामूहिक तथा सामुदायिक प्रयासों के प्रति उपेक्षा का भाव रहा है। आमजन के प्रति लोकसेवकों तथा जनप्रतिनिधियों के इसी उपेक्षा भाव ने राज्य में राज्य गठन की मूल आवधारणा के विपरीत कार्य किया है। 

किसी भी क्षेत्र के विकास तथा जनहित में कार्य करने के लिए लोकसेवकों तथा जनप्रतिनिधियों में जनसेवा का भाव जाग्रत होना आवश्यक है परन्तु राज्य गठन के बाद अभी तक राज्य को कोई भी ऐसा नेतृत्व नहीं प्राप्त हो पाया है जिसको आदर्श मानकर राज्य हित लोकसेवक तथा जनप्रतिनिधि कार्य कर सकें।

देव संस्कृति में कार्यों के निष्पादन के लिए भावों का जाग्रत अवस्था में रहना आवश्यक बताया गया है। हमारे मन में जिस समय जैसे भाव उत्पन्न होते हैं हमारे कार्य भी उसी ओर उन्मुख हो जाते हैं। यानि की जीवन में भावों का बहुत अधिक महत्व है। 

युजन्तियस्व कामो हरि विपक्षसा रथे, शोणा धृष्णू .... 

कामोदाता कामोप्रतिगृहिता कामोतत्तै।

जनहित से जुड़ी समस्याओं के समाधान का सीधा एवं सरल उपाय यह है कि, जनप्रतिनिधि तथा लोक प्रशासक निष्ठापूर्वक किसी भी समस्या का समाधान तभी कर सकते हैं जब वह परिवार या स्व कैरियर के बजाय जनसेवा को जीवन का उद्देश्य मानकर आगे बढ़े। जन से जुड़ी हुई किसी भी समस्या का निरन्तर बने रहने का आशय जन के प्रति निष्ठा का अभाव ही है। जनप्रतिनिधियों तथा लोकसेवकों की स्वार्थपरता कष्टकर स्थितियां उत्पन्न कर रही है। वास्तव में वर्तमान में हमारा प्रदेश उत्तराखण्ड इस समय लोकसेवकों तथा जनप्रतिनिधियों की स्वार्थपरता में फंसकर दिशा रहित हो रहा है। लोकसेवकों तथा जनप्रतिनिधियों के बढ़ते वेतन भत्ते तथा सुविधाएं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऐसा लगता है कि, हमारे जनप्रतिनिधि तथा लोकसेवकों का स्वहित, स्व सुविधाओं को बढ़ाना तथा आरामप्रस्त जीवन जीना ही प्रथम लक्ष्य है। जब व्यक्ति स्व सुविधाओं को केन्द्रित कर कार्य करने लगता है तो जनहित स्वयं ही गौण हो जाते हैं। गौण हुए जनसेवा भाव से कभी भी जनहितैषी कार्य नहीं किये जा सकते हैं। कहते हैं भावों में भगवान बसते हैं। भाव उत्पन्न होगें तो भगवान प्रकट होगें परन्तु भाव निश्चल तथा निष्कपट होने चाहिए। 

 यदि सच्चे अर्थों में जनसेवा करनी है तो स्वयं के अन्दर जनसेवा का भाव जाग्रत करना आवश्यक है परन्तु अभी राज्य के जनप्रतिनिधियों तथा लोकसेवकों में जनसेवा के भाव का अभाव प्रतीत हो रहा है, इसीलिए प्रदेश में जनसमस्याओं का अम्बार लग चुका है। आज आवश्यकता इस बात है कि, राज्य हित में लोकसेवक तथा जनप्रनिधि मन में जनसेवा का भाव जाग्रत करें। तभी उत्तराखण्ड राज्य का जिन उद्देश्यों को लेकर गठन हुआ था उन उद्देश्यों को प्राप्त कर पायेगा।  

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